गुलाबी चूड़ियाँ (Gulabi Chudiyan) Nagarjun


प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!

सामने गियर से उपर
हुक से लटका रक्खी हैं
काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी
बस की रफ़्तार के मुताबिक
हिलती रहती हैं…

झुककर मैंने पूछ लिया
खा गया मानो झटका
अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा
आहिस्ते से बोला: हाँ साब

लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया
टाँगे हुए है कई दिनों से
अपनी अमानत
यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने
मैं भी सोचता हूँ

क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ
किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?
और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा
और मैंने एक नज़र उसे देखा।

छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में
तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर
और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर
और मैंने झुककर कहा -

हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ
वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे
वर्ना किसे नहीं भाएँगी?
नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!
--नागार्जुन

5 टिप्पणियाँ:

Shilpa ने कहा…

Love this poem. I remember reading this in school. I am linking to this post in my blog. Thanks.

AnjuGandhi ने कहा…

nothing can be compared to the love between father and daughter. with father's day approaching on sunday my best wishes to all the fathers of the world

बेनामी ने कहा…

yeah that's true.

Arva ने कहा…

Thanks a LOT for posting this. I just felt like searching this poem and stumbled upon ur pages.. I loved this poem in school and still do :)
~ Arva

Arva ने कहा…
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